Sunday, September 17, 2017

गीत प्रेम के गाओ फिर से

गीत प्रेम के गाओ फिर से
आओ गले लग जाओ फिर से
बहुत रह चुका विरान गुलशन
फूल बन खिल जाओ फिर से
अलग थलग बहुत जी लिये
अब तो एक हो जाओ फिर से
मेरी सुनो, मै सुनू तुम्हारी
कहानी नई बनाओ फिर से
रोज की किटकिट  से मन ऊब गया है
पैगाम प्यार का लाओ फिर से
जिम्मेदारीयो की आंधी मे जो बुझ गया
दीपक वो प्यार का जलाओ फिर से

आहुति अधूरी है

प्रेम के हवन की कुछ आहुति अधूरी है
दबी भावनाओं का निकलना जरूरी है
गुजर गए बरसो यूं ही बिना बरसे ही
मुहब्बत के बादलो का पिघलना जरूरी है
तू एक बार कहदे, सारे बंधन तोड़ आऊ
जिन्दा रहना है तो अब मिलना जरुरी है
तेरी बाँहो में लिपट के जीना या मर जाना
अंजाम कुछ भी हो, लिपटना जरूरी है
जानता हूँ , अब गलत है , जो कह रहा हूँ मै
अपने किये वादे पर तुझे भी चलना जरूरी है
जाने कब साँझ हो जाये मेरे जीवन की
तेरे प्रेम का आखरी दीपक जलना जरूरी है

Friday, November 4, 2016

हमें प्यार हो गया

इतनी महँगाई, और हमें प्यार हो गया
दिल का गुलशन गुलजार हो गया 
दिल और आँखों के तो आ गए मजे
जेब का लेकिन बंटा धार हो गया
हम सुबह से भूखे प्यासे लगे रहे जुगाड़ में
शाम को पिज्जा हट में उनका शनिवार हो गया
मिस काल मारकर चलाते रहे अपना काम
उन्होंने किया फोन,  और उनका  रिचार्ज को गया
अपनी बाइक आधे दाम में बेच दी ?
जन्मदिन था उनका, मजबुरी देना उपहार हो गया
मिलने का वादा, और अपनी जेब खाली
बहुत अच्छा हुआ, जो उनकी मम्मी को बुखार हो गया

Tuesday, July 29, 2014

सहारनपुर

प्रिय मित्रो, प्रणाम
आज बहुत दिनों के बाद कोई कविता बनी है कविता क्या दिल का दर्द बाहर आया है


फीकी हो गयी मिठास शीर की 
चटपटी न लगी आज  फुलकियां 
हर निवाले के संग आँखों में 
आती, जलती दुकानो की झलकियाँ 

शर्मसार है आज  इंसानियत यहाँ 
क्या झांकते हो खोलके खिड़कियां  ?

सलामत दोस्त को घर पहुचाना कसूर था 
बड़ी बहादुरी दिखाई चला के उसपे गोलियाँ 

एक मुद्दत लगी थी उसको रोजी चलाने  में 
पल में जलवा  दिया  पाने को सियासी सुर्खियाँ 

क्या हिन्दू क्या मुसलमां सब एक से है 
तुम सबको प्यारी है तो सिर्फ अपनी कुर्सियाँ